ग़ालिब चचा को याद करते हुई फिर से शायरी की पारी का बिस्मिलाह ... !
३ दशकों से जाँचा परखा नुस्खा, शायरी को भी खुजाल ए मजाल का एक शर्तिया इलाज़ ही माना जा सकता है!
हर जगह मौजूद, जो एक फरिश्ता सा है,
गर ना है वो भरोसा, तो फिर बता क्या है?!
है उसका जलवा कुछ यूँ की - मैं ही तो हूँ सबकुछ..!
है अपनी जुस्तजू भी यूँ की - बाद ए सबकुछ, भला क्या है?!
है उसका रुतबा ए फैसला की - "जो सुना दिया, तो बस हो गया..!"
है अपनी ज़िद भी कुछ यूँ की, दिखा दें - हौसला क्या है!!
ऊपरवाला गोया बना है, शायरी ग़ालिब की,
मजाल सर खपाते - "ये मांजरा क्या है?!!"