Friday, August 28, 2026

Synopsis : तदात्मानं सृजाम्यहम् - A Psychological Philosophical Thriller






-------------------------------------------------------------------------------------------- Synopsis : तदात्मानं सृजाम्यहम् - A Psychological Philosophical Thriller --------------------------------------------------------------------------------------------
एक सामान्य-सी लगने वाली ट्रेन यात्रा।एक यात्री, जिसके बारे में किसी को कोई विशेष कारण नहीं मालूम—सिवाय इसके कि उसे इस यात्रा के समाप्त होने से पहले मरना है। उसे मारने की सुपारी एक ऐसे गुप्त, बेहद पेशेवर नेटवर्क को दी गई है जो वर्षों से अपने काम, अनुशासन और अघोषित नैतिक नियमों के लिए जाना जाता है। उन्हें बताया गया है कि उनका लक्ष्य एक अत्यंत खतरनाक व्यक्ति है—देश के लिए गंभीर खतरा, ऐसा व्यक्ति जिसके कारण होने वाली संभावित क्षति इतनी बड़ी है कि उसके रास्ते में आने वाली कुछ निर्दोष जानें भी “बड़ी भलाई” के लिए स्वीकार्य हैं। काम उनके लिए नया नहीं है। लेकिन यह आदमी है। यात्रा आगे बढ़ती है और नेटवर्क के अलग-अलग सदस्य ट्रेन में और ट्रेन के बाहर अपनी भूमिका निभाते हुए लक्ष्य पर निगाह रखते हैं। उनके पास कई योजनाएँ हैं—और हर योजना के साथ एक विकल्प: कम से कम नुकसान में काम कैसे पूरा किया जाए। लेकिन धीरे-धीरे उनके बीच होने वाली बातचीत, सूचनाओं का आदान-प्रदान और स्वयं लक्ष्य के व्यवहार का प्रत्यक्ष अनुभव एक असहज प्रश्न पैदा करता है।उन्हें जिस आदमी के बारे में बताया गया था, वह आदमी दिखाई क्यों नहीं दे रहा? जिसे स्वार्थी, हिंसक, विभाजनकारी और राष्ट्र-विरोधी बताया गया था, उसके कर्म उसके ठीक विपरीत दिखाई देने लगते हैं। हर नया अनुभव उनके भीतर के विश्वास को थोड़ा और हिलाता है। मगर उनके सामने केवल नैतिक प्रश्न नहीं है—उनकी प्रतिष्ठा, उनका पेशेवर धर्म और वर्षों से बनाए गए उनके अपने उसूल भी दाँव पर हैं। इसी अनन्त प्रश्न, अनन्त द्वंद्व और अनन्त आत्म-सुधार की यात्रा के बीच गूँजता है : उन्होंने सुपारी स्वीकार की है। उनका रिकॉर्ड कभी असफल नहीं हुआ। और उनके लिए काम से पीछे हटना केवल गलती नहीं—इज़्ज़त खोना है। दूसरी ओर, उनके भीतर वर्षों से दबा हुआ एक और प्रश्न जागने लगता है— क्या हर हत्या को किसी बड़े उद्देश्य के नाम पर उचित ठहराया जा सकता है? क्या सही और गलत के बीच की रेखा वास्तव में उतनी स्पष्ट है जितनी हमें बताई जाती है? और अगर किसी को मारना “देशहित” है, तो यह तय कौन करता है कि देशहित क्या है? जैसे-जैसे ट्रेन अपनी मंज़िल की ओर बढ़ती है, हत्या की योजनाएँ और अधिक गंभीर होती जाती हैं—और उसी अनुपात में आत्मचिंतन भी। उधर, इस पूरे षड्यंत्र के पीछे मौजूद एक शक्तिशाली राजनीतिक-व्यावसायिक नेटवर्क लगातार सूचना और निर्देश पहुँचाता रहता है। उन्हें पता है कि यह व्यक्ति भविष्य में उनके लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। उन्होंने महीनों की निगरानी, सूचनाओं और योजनाबद्ध गलत जानकारियों के सहारे उसके बारे में एक ऐसी तस्वीर तैयार की है जिसे सुपारी नेटवर्क ने सच मानकर स्वीकार किया है। लेकिन अब एक समस्या पैदा हो चुकी है— सुपारी लेने वालों ने लक्ष्य को स्वयं देख लिया है। और कभी-कभी किसी मनुष्य के बारे में सबसे शक्तिशाली सूचना वह होती है जो किसी dossier में लिखी ही नहीं होती। धीरे-धीरे लक्ष्य उनके लिए केवल “एक आदमी” नहीं रह जाता। उनके भीतर की अपनी वर्षों पुरानी तलाश—अपने कर्मों का अर्थ, अपने अपराधों का औचित्य, मुक्ति की संभावना और सत्य की खोज—उस आदमी के सामने आकर जैसे अपना प्रतिबिंब देखने लगती है। उन्हें उसमें वही दिखाई देने लगता है जिसकी तलाश वे स्वयं करते रहे हैं। और यहीं कहानी अपना सबसे खतरनाक मोड़ लेती है। एक तरफ़ व्यवस्था द्वारा निर्मित “दुर्जन”। दूसरी तरफ़ उनके अनुभव से दिखाई देता एक लगभग दिव्य मनुष्य। लेकिन क्या वास्तव में वह वैसा ही है? या वे केवल अपने भीतर की तलाश को उसके चेहरे पर पढ़ रहे हैं? ट्रेन अपनी अंतिम अवस्था में पहुँचती है। अब समय समाप्त हो रहा है। सुपारी नेटवर्क के सामने आखिरी अवसर है। उन्हें अपना काम पूरा करना है—या अपने ही बनाए उसूलों के विरुद्ध जाना है। एक तरफ़ पेशेवर धर्म। दूसरी तरफ़ अंतरात्मा। एक तरफ़ मृत्यु। दूसरी तरफ़ वह प्रश्न जिसका उत्तर शायद स्वयं जीवन के पास भी नहीं। और फिर— सामना होता है। निर्णय का क्षण आता है। लेकिन कहानी निर्णय नहीं सुनाती। क्योंकि शायद अंतिम निर्णय किसी कहानीकार का अधिकार है ही नहीं। क्या सही है? किसे जीवित रहना चाहिए? किसे मरना चाहिए? अच्छाई और बुराई के बीच वास्तविक अंतर कितना है? और जब मनुष्य अपने कर्मों के अंतिम अर्थ तक पहुँचने की कोशिश करता है, तो क्या उसे कभी निश्चित उत्तर मिलता है? शायद नहीं। क्योंकि ब्रह्मांड स्वयं एक अनन्त रहस्य है—और मनुष्य का आत्मचिंतन भी।
इसी अनन्त प्रश्न, अनन्त द्वंद्व और अनन्त आत्म-सुधार की यात्रा के बीच गूँजता है:

---------------------------------------------------------- यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ (Bhagavad Gita - Chapter 4, Verse 7) ---------------------------------------------------------- कौन राम है। कौन रावण है। कौन सही है। कौन गलत। और अंतिम क्षण में निर्णय कौन करेगा—यह फैसला शायद दर्शक का है। तदात्मानं सृजाम्यहम् एक ऐसी कहानी जिसमें हत्या का प्रश्न धीरे-धीरे अस्तित्व के प्रश्न में बदल जाता है...


----------------------------------------------------------------------------- तदात्मानं सृजाम्यहम् - A Psychological Philosophical Thriller.. -----------------------------------------------------------------------------

WIP ... ;)

Linked : https://fizool.blogspot.com/2010/10/blog-post_05.html

Friday, May 15, 2026

!! Fictional-o-Graphy - Coming Soon ... !!

!! Fictional-o-Graphy - Coming Soon ... !! 



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Jai Ho !!

Tuesday, April 28, 2026

या खुदा! ये मांजरा क्या है..?

ग़ालिब चचा को याद करते हुई फिर से शायरी की पारी का बिस्मिलाह ... ! 

३ दशकों से जाँचा परखा नुस्खा, शायरी को भी खुजाल ए मजाल का एक शर्तिया इलाज़ ही माना जा सकता है!   

हर जगह मौजूद, जो एक फरिश्ता सा है,
गर ना है वो भरोसा, तो फिर बता क्या है?!
है उसका जलवा कुछ यूँ की - मैं ही तो हूँ सबकुछ..!
है अपनी जुस्तजू भी यूँ की - बाद ए सबकुछ, भला क्या है?!
है उसका रुतबा ए फैसला की - "जो सुना दिया, तो बस हो गया..!"
है अपनी ज़िद भी कुछ  यूँ की, दिखा दें - हौसला क्या है!!
ऊपरवाला गोया बना है, शायरी ग़ालिब की,
मजाल सर खपाते - "ये मांजरा क्या है?!!" 





Saturday, April 18, 2026

Tennis Documentary - Promo

भाईलोगों और बहनलोगों के साथ मिल कर नया शगल :\
                                              
                                                                            ------


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शूटिंग पूरी हो चुकी है , पोस्ट प्रोड्कशन भी, अगले महीने रिलीज़ कर का विचार है.

माहौल बनाना आज से शुरू  ...

जय हो! 


Tuesday, March 17, 2026

V४ क्रांति - अंदाज़-ए-बयाँ और.....!

इस साल का अपना पहला पोस्ट, अगले का कमिटमेंट सलमान भाई से ले लें ..!!


तो प्रस्तुत है — हिंदी फोरम  मंच पर एक नई पहल  “चर्चा मंच” - V४ क्रांति - ग़ालिब का अंदाज़-ए-बयाँ  आखिर यूँ ही नहीं राजनीगंधा बन जावत है ससुरा ...!

यह केवल एक मंच नहीं, बल्कि विचारों का संगम है… जहाँ हम सभी — ब्लॉगर भाईलोग, लेखक मित्र, और जो भी समसामयिक विषयों पर अपनी दृष्टि रखते हैं — एक साथ आकर अपने विचार साझा करेंगे।

क्या होगा यहाँ? सरल सा है —
👉 अलग-अलग समसामयिक विषयों पर आप सभी को आमंत्रित किया जाएगा
👉 आप अपने विचार वीडियो के माध्यम से साझा करेंगे
👉 उन विचारों को हम सहेजकर, संवारकर एक पॉडकास्ट रूप देंगे
👉 और फिर उसे YouTube पर प्रस्तुत करेंगे

मतलब… आपकी आवाज़, आपका विचार — एक बड़े मंच तक पहुँचेगा।

क्यों?
क्योंकि अब समय है सिर्फ लिखने का नहीं, विचारों को प्रवाहित करने का
समय है संवाद का, सहभागिता का, और एक सच्ची “विचार क्रांति” का।

तो अपील है —
सभी लेखक, ब्लॉगर, और जो भी सोचते हैं कि उनके पास कहने को कुछ है…
आपका स्वागत है 🙌

आपका सहयोग ही इस पहल को दिशा देगा, और ऊर्जा भी।

आइए, मिलकर एक नई लहर शुरू करें —
“विचार क्रांति — v4 क्रांति” 🔥

बाकी बातें… अब मंच पर होंगी 😉 जल्द मिलते हैं, अपने विचारों के साथ!

जय हो !








Wednesday, December 31, 2025

थाली में सिर्फ रोटी और अचार था...!!! : New Year Funny Shayari (मजाल )

आरंभ है प्रचंड @ झेलन प्रक्रिया .. ! 

 जैसे बीते है पिछले बरस, वैसे ही हो आगे सरस, 
मिला जुला कर लगभग यही, बातों का सार था..! 
चटकारे जिंदगी के लिए, जुबान-ए -नज़रिये से 'मजाल', 
हिसाब लगाते, तो थाली में सिर्फ रोटी और अचार था...!!! 




 सादर :) 

Monday, November 10, 2025

!!!! बटुक सप्ताह - बाल दिवस विशेष !!! १४ नवंबर २०२५ !!!

८ नवम्बर से १४ नवम्बर २०२५, बाल दिवस तक, DJV4team की तरफ से सुनिए रोज़ नए बाल गीत !!
08.11.2025 - The मोटूराम Anime Song !! 09.11.2025 - पतंग-बाज़ी - The Kite Anime Song !! 10.11.2025 - कुछ तोबी Anime Song !! 11.11.2025 - बंटी की बज गई घंटी Anime Song !! 12.11.2025 - सूरज दादा गुस्से में Anime Song !! 13.11.2025 - कट्टी - पुच्ची !! Anime Song !! 14.11.2025 - चड्डी पहन के फूल खिला है Anime Song !! !!! ENJOY !!! DJV4.IN Team ( djv4team@gmail.com )
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08.11.2025 - The मोटूराम Anime Song !!
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Lyrics : मोटूराम ! मोटूराम ! दिन भर खाते जाए जाम, पेट को न दे जरा आराम, मोटूराम ! मोटूराम ! स्कूल जो जाए मोटूराम, दोस्त सताए खुलेआम, मोटू, तू है तोंदूराम ! हमारी कमर, तेरा गोदाम ! तैश में आएँ मोटूराम ! भागे पीछे सरेआम, पर बाकी सब पतलूराम ! पीछे रह जाएँ मोटूराम ! रोते घर आएँ मोटूराम, सर उठा लें पूरा धाम, माँ पुचकारे छोटूराम, मत रो बेटा , खा ले आम ! जब जब रोतें मोटूराम, तब तब सूते जाए आम, और करें कुछ, काम न धाम, मुटियाते जाएँ मोटूराम ! एक दिन पेट में उठा संग्राम ! डाक्टर के पास मोटूराम, सुई लगी, चिल्लाए ' राम' ! ' राम, राम ! हाए राम !' तब जाने सेहत के दाम, अब हर रोज़ करें व्यायाम, धीरे धीरे घटा वज़न, पतले हो गए मोटूराम !

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09.11.2025 - पतंग-बाज़ी - The Kite Anime Song !!
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Lyrics : जोत उसके बाँध के, तराजू जैसे नाप के, सर मोड़ काँफ के, हवा बहाव नाप के, एक दे उड़न छी, एक गट्टा सँभाल के. ये उड़ी अपनी पतंग, हवा के साथ संग संग, हवा तेज़ - साधो सनन , हवा कम - ठुमके ठन ठन ! कागज़ की अपनी पतंग, हवा उड़े सर सर, पन्नी की छोटी पतंग , शोर बड़ा 'सड़ सड़ !' डोर खीच हड बड़ , कटे हाथ घड़ धड़ ! उड़ते हुए खुले जोत, तो गोते खाए तेज़ से, फटे तो मरहम लगाओ , चावल आटे लेप से ! कभी उड़े चील सी, कभी गोतेबाज़ सी, कभी पेड़ उलझे कभी, डोर फांसे पक्षी ! बाजू छत मुन्ना, धोंस दे लफंगा! मेरे कन्ने डग्गा, मेरेसे नई पंगा ! मैंने है करवाया हेगा, काँच वाला मंझा ! निकालेंगे हम इसकी हेंच, आ बच्चू , लड़ा ले पेंच ! आसमां में निगाहें, जमी सबकी एक सी, अब होगे फैसला, जीतेगा बस एक ही, एक तरफ सांकलतोड़ , एक तरफ बरेली ! कान बाज़ , चाँद बाज़ इक दूसरे के आस पास ! भिड़ जाए ऐसे दोनों , झपटा मारे जैसे बाज़, मंझे उलझे मंझे से, तेज़ हो साँसों के साज़ ! " ढील ! ढील ! ढील ! ढील ! " " खेंच ! खेंच ! खेंच ! खेंच ! " " ढील ! " "खेंच ! " "ढील ! " " खेंच ! " " काटा sssssss है ...... ! "

Tuesday, July 8, 2025

Marriage Anniversary Special - 'म-जारा'-ए-marriage (मजाल) (Chat-GPT के सौजन्य-ए-जुगलबंदी से !)

जो तेरे साथ पूरी जिंदगी का गुजारा हो जाए, तो 'मजाल' कदाचित ऐसा म-जारा हो जाए, की ए-क ए-क करके सारे सपने हो हकीकत, रो-जाना nightmares का साक्षात नजारा हो जाए! जो तेरे साथ पूरी ज़िंदगी का गुज़ारा हो जाए......❤️ सुबह उठते ही चाय मिले — पर गरम न हो, न्यूज़पेपर से पहले तेरा मूड हरदम नरम न हो... तो क्या कहें उस सना-तनी इत्तेफाक को, जो म-जारा बन जाता हर इतवार को! सपनों में जो कभी थे Maldives, Paris, Santo-rini, अब हो चुके हैं पास — पर Google Street View में ही सही! 😅 कभी थे candle-light dinner के ख्वाब, अब मिक्स वेज की सब्ज़ी और बच्चों के maths का जवाब! 😵‍♂️ रातों के वो रोमांटिक whispers जो दिल को बहकाते थे, अब "तू गैस सिलेंडर भरवा ले" में बदल जाते हैं! 'मजाल' खुद को दे दिलासा, हरि-दय को यूं समझाते है, की भाई - 'सच कहें तो यही असली प्यार का म-जारा है, जहाँ हर झगड़ा भी एक किस्म का इशारा है, कि “मैं नाराज़ हूँ” का मतलब — “बस गले लग जा यारा” है! ❤️ जो तेरे साथ पूरी ज़िंदगी का गुज़ारा हो जाए......❤️ तेरे साथ ज़िंदगी का सफ़र जब शुरू हुआ, तो सोचा था — थोड़ा सा हसीन, थोड़ा सा 'चलो देखा जाएगा' types होगा। पर जो हुआ… वो तो पूरा एक daily soap निकला, जिसमें मैं ही हीरो भी, विलन भी… और victim और vin-dict भी! 😂 पर मानता हूँ, तेरी मुस्कान — हाँ - वही, जो selfie में कम आती है! वो मेरे दिन के सबसे bright moments में से एक है। fantasies चाहे आदतन दुनिया भर की पाले 'मजाल' मगर, तुझसे जियादह किसी और को झेलना mandrick मायाजाल में भी fake है! तो मेरी जान, मेरी वाइफ, मेरी WiFi की असली यूज़र, Happy Anniversary — तेरे साथ ये म-जारा, हर साल और शानदार होता जाए। और जो तू अब तक समझ नहीं पाई मुझे, तो कोई बात नहीं — इस बार हम 'ChatG-P-T' को भी अपनाए! इस उम्मीद में की तेरा थोड़ा थोड़ा decode हो जाए! और अपने सनातनी प्रेम मे यह - much needed upgrade हो जाए!! तो इस सालगिरह पर, चलो फिर वो effect renew करते हैं, थोड़ी चिकचिक, थोड़ी हंसी — को fantasies में पूरा करते हैं। क्योंकि शादी नाम की ये जो जुगलबंदी है, यही तो सबसे epic किस्म का म-जारा बंदी है! जो तेरे साथ पूरी ज़िंदगी का गुज़ारा हो जाए......❤️

Saturday, June 14, 2025

!!! हिन्दी दिवस महा-कुंभ (04-06-2025 से 14-09 -2025 तक !!!! - !!! जीतिए रु.1,00,000/- तक के नकद पुरस्कार !!!

फुलटू promotional पोस्ट! 

भाइलोगों ने हिन्दी दिवस हेतु कुछ तगड़ा planning किया है बिड़ू !

!!! 80 दिन शेष !!!

!!! हिन्दी दिवस महा-कुंभ (04-06-2025 से 14-09 -2025 तक !!!!

!!! जीतिए रु.1,00,000/- तक के नकद पुरस्कार !!!

!!! प्रत्येक Approved Participation के लिए Guaranteed Gift !!!


• श्रेणी 1 - स्वरचित कविता/गीत + AI Music Composition
viewtopic.php?t=4558

• श्रेणी 2 – हिन्दी की प्रसिद्ध रचनाओं (गीत/कविता/भजन/दोहे आदि) + AI Music Composition
posting.php?mode=edit&p=14561

• श्रेणी 3 - स्वरचित कथा/कविता/लेख
viewtopic.php?t=4560

• श्रेणी 4 - विश्व साहित्य (कथा/कविता/लेख) का हिन्दी देवनागरी में रूपांतरण (स्वयं द्वारा सत्यापित)
viewtopic.php?t=4561



अधिक  जानकारी के लिए यहाँ पधारे!

Wednesday, June 4, 2025

'यदि' - Rudyard Kipling's Poem 'If" का हिन्दी भावार्थ !


यदि रख सके तू होश, जब दे रहे सब दोष, 
विश्वास धरे खुद पर, हो किसी के प्रति न रोष। 
यदि सब तुझको झुठलाएँ, फिर भी रहे तू शांत, 
रखे मान उनके संदेह का, रहकर सहज सभ्रांत। 

यदि धर सके  तू धैर्य, बिन किए उसका बखान, 
अपने अंदर समेटे जो, है सनातनी आयाम! 
यदि घृणा करे कोई तुझसे, पर तुझमें द्वेष न जागे, 
न करे आडंबर कोई, न वाणी से ज्ञान बागे। 

यदि सपने देख सके तू, पर बने न उनका दास, 
विचार करे अवश्य, न करे पर वो तुझ पर राज! 
यदि क्षण शगुन के आए, अथवा हो क्षण आलाप, 
न अधिक विजय को तूल, न पराजय का संताप! 

यदि जान सके वो सच तू, बस एक अटल जो यारा, 
मा-या नगरी में जिसने, कितनों को है भर-माया । 
या देख सके सपने बिखरे - जिन पर जीवन था वारा,
और फिर जर्जर औज़ारों से, निर्माण करें दोबारा। 

यदि सब-कुछ दांव लगाने का, रखता है तू बूता, 
और खो कर सब फिर शांत ह्रदय से, बांधे फीता जूता! 
यदि हृदय, स्नायु, और मन, जब तेरा साथ छोड़ जाए, 
फिर भी एक इच्छा कहे,"थकना नहीं - बढ़ते जाएं।" 

यदि शूरवीर रहे तू भीड़ में, पर धरे धर्म-अनुशासन, 
और मिले सम्राटों से तू, रख कर खुद को साधारण । 
यदि न शत्रु तुझे छल सके, न प्रियजन से तू रूठा, 
माने सबको तू अपना, पर विच्छेदों से न टूटा। 

यदि हर क्षण को दे सके तू, गहन श्वासो की दौड़ , 
तो यह पूरी दुनिया तेरी, न किसी से तेरी होड़! 
'मजाल' तत्व से अवगत, मेरे प्यारे 'तथागत',
अपने हाथ फैलाए दोनों, जीवन करता तेरा स्वागत..!

(आशुतोष उपाध्याय जी के सौजन्य से )

Tuesday, February 25, 2025

अपन इंदौरी मासिक पत्रिका के लिए लेख, लघु कथा और कविता आमंत्रित है !!!


अपन इंदौरी एक पत्रिका के लिए लेख, लघु कथा और कविता की तलाश कर रहा है जिसके लिए निम्नलिखित श्रेणियों और दिशानिर्देशों का पालन करना आवश्यक है:

श्रेणियाँ
1. लाइफ़स्टाइल'
2. मनोरंजन
3. यात्रा और साहसिक गतिविधियाँ
4. व्यवसाय और वित्त
5. प्रौद्योगिकी और नवाचार
6. कला और संस्कृति
7. शिक्षा और सीखना
8. समाज और राजनीति
9. खेल और फिटनेस
10. विज्ञान और प्रकृति

दिशानिर्देश
1. रचना मौलिक होनी चाहिए।
2. किसी भी तरह की विवादित टिप्पणी नहीं होनी चाहिए।
3. लेख किसी भी समाज, जाति, धर्म या वर्ग की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहिए।
4. लेख के साथ परिचय, फोटो और अनुमति पत्र भेजना आवश्यक है।
5. चयनित लेखकों को प्रति शब्द 1 रुपये के हिसाब से भुगतान किया जाएगा।
6. लेख creativeurja@gmail.com पर भेजे जा सकते हैं।

Monday, September 2, 2024

हिन्दी डिस्कशन फोरम (www.HindiDiscussionForum.com) - हिन्दी प्रेमियों को एक सूत्र में पिरोने की सुभावना और एक पुरानी खुजाल की कमबैक !

एक दशक पहले की खुजाल,
फिर से शुरू हो गई है मजाल,
जाने अब क्या करेगी बवाल,
माने इसे  ऊपरवाले का कमाल ;)


कुछ भाईलोगो ने मिल कर हिंदी की फोरम तैयार करी थी । एक मोहतर्मा  ने उस पर एक लेख भी लिख डाला था । करीबन एक दशक बाद फिर से भाइलॉग फॉर्म में दिख रहे है। हालकि फोरम पर नया लेख लिखने को कोई राजी नहीं हुआ ! 

अतः ११ बरस पहले की याद को तारों ताज़ा होने का सुअवसर ......... ;)

हिंदी डिस्कशन फोरम  - हिंदी प्रेमियों को एक सूत्र में पिरोने की सुभावना से किया गया एक सामूहिक प्रयास .... एक बार फिर से ..... !

फोरम एक ऐसा मंच है जहाँ लोग विभिन्न विषयों पर अपने विचार और आइडियास बांटते हैं | एक ओर जहाँ फोरम आपको अपनी सोच व्यक्त करने का मौका देता है वहीँ दूसरी ओर वह आपकी सोच को नया आयाम भी देता है | फोरम के द्वारा आप न केवल किसी विषय अपने विचार लोगों तक पहुंचा सकते हैं बल्कि उस विषय पर अन्य लोगों की प्रतिक्रियाओं द्वारा उनके विचार भी जान सकते हैं | डिस्कशन फोरम्स का एक और फायदा यह भी है कि यहाँ आप ढेर सारे विषयों पर जानकारी हासिल कर सकते हैं, जो आपकी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में काम आ सकती हैं | फोरम पर साझा किये गए विचारों से चीज़ों को देखने का हमारा नज़रिया भी बदलता है |

इंटरनेट पर बहुत से ऐसे फोरम मौजूद हैं जो आपको अपनी बात कहने का मौका देते हैं, पर जिस तरह ज़्यादातर वेबसाइट्स अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध हैं उसी तरह फोरम्स भी ज़्यादातर अंग्रेज़ी भाषा में ही हैं | इसी बीच हिंदी डिस्कशन फोरम सभी हिंदी प्रेमी लोगों के लिए एक ऐसा मंच लेकर आया है जहाँ लोग अपने मन की बात को हिंदी में व्यक्त कर सकते हैं |

हिंदी डिस्कशन फोरम पर राजनीति, साहित्य, संस्कृति ओर कला जैसे गंभीर विषयों के साथ साथ आप फिल्म, खेल ओर संगीत जैसे मनोरंजक विषयों पर भी चर्चा कर सकते हैं | इस फोरम का इस्तेमाल करने के लिए आपको केवल इस फोरम पर रजिस्टर करने की ज़रूरत है | रजिस्ट्रेशन कन्फर्म होने के बाद आप अपने मन चाहे विषय पर खुले दिल से अपने विचार प्रस्तुत कर सकते हैं | जिस प्रकार किसी भी पत्र पत्रिका की लोकप्रियता के लिए उसमें दिलचस्प और ज्ञानवर्धक लेख होने चाहिए जो रीडर्स को उसके साथ बांधे रखे, उसी तरह डिस्कशन फोरम पर भी लिखे दिलचस्प और ज्ञानवर्धक टॉपिकस उसे लोगों में लोकप्रिय बनाते हैं | 

इंटरनेट पर उपलब्ध हिंदी डिस्कशन फोरम आपकी बातों और विचारों को केवल भारत के ही लोगों तक नहीं बल्कि अन्य देशों में बसे हिन्दी जानने वाले लोगों तक भी पहुंचता है | इस तरह के डिस्कशन फोरम में हिस्सा लेने से न केवल आपके ज्ञान में वृधी होती है बल्कि आप अपनी बातों और विचारों को लोगों के सामने सही तरीके से प्रस्तुत करना भी सीख जाते हैं | हिंदी डिस्कशन फोरम अपने आप में एक अनोखा मंच है जो आप सभी लोगों को इस में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित कर रहा है | आप सभी के विचारों और सोच को हम एक साथ एक मंच पर पूरी दुनिया के साथ साझा करना चाहते हैं | 

इस फोरम को सफल बनाने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित है |


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Tuesday, July 16, 2024

हास्य कविता - जन्मदिन की बधाई!



हमने कहा उनसे,
आई 16 जुलाई
बधाई हो बधाई,
तो बोले वो हमसे,
काहे की बधाई?
आई (मदर इन मराठी)16 जूं-लाई
16 से 100 हुए भाई,
डैंड्रफ दियो बढ़ाई,
गिर गए बाल, भाई,
काहे की बधाई?!

तब हम उन्हें समझाई,
व्हाट आई मीन टू से इज,
टुडे इस दी 16th ऑफ़ जुलाई,
हैप्पी बर्थडे टू यू पाई ! 👏👏

आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं l 🙏

Enjoy! 🍫🍿🧃

Originally posted in and as AdminV :
https://hindidiscussionforum.com/viewtopic.php?p=10#p10

PS : आने वाले हैं भिया धीरे धीरे अपनी वाली में.... फुलट्टू ;)
Post Reply 

Sunday, July 7, 2024

कविता - यह 'कुछ', ही 'सब-कुछ' है .. !

जीवन की राह में मेरे प्रिय,,
 लम्हा ऐसा भी आता है,
अंतिम लगता है सबकुछ जब,
किन्तु फिर कुछ बच जाता है.

जीवित है की मृत मरा नहीं,
प्रमाण यही तो अवगत है,
जीवन जीने का इच्छुक है,
बाकी बचा कहीं कुछ है,
(और ) सच जान इसे तू मेरे प्रिय !
यह 'कुछ', ही 'सब-कुछ' है .. !

निराशा-बादल के भीतर ,
आशा-बूँदें भी शामिल है,
हर पल,हर घड़ी , हर एक लम्हा,
मौका बनने के काबिल है.

गहरी बदरी जितनी उतनी,
मूसला-बारिश के लक्षण है,
हर अनुभव बन कर नसीहत,
कुछ  सिखलाने में सक्षम है !

हर ख्व्वाब, हर एक तेरा सपना,
पूरा जीने के लायक है,
सच जान इसे तू, मेरे प्रिय !
(ये) सपने ही असल हकीकत है !

ये स्वप्न यहीं दर्शाते की,
जीवन जीने का इच्छुक है,
बाकी बचा कहीं कुछ है,
(और) सच  जान इसे तू , मेरे प्रिय !
यह 'कुछ', ही 'सब-कुछ' है .. !

(रूचि अग्रवाल जी के सौजन्य से) 

Sunday, March 17, 2019

हास्य नाटक - 'कचौड़ी योग'



 प्रस्तावना
 
नमस्ते| आप सभी का स्वागत है| अब हम लोग आपके सामने जो नाटक पेश करने जा रहे हैं, 
 उसका शीर्षक है  - “कचौड़ी योग!” आप सभी लोगों ने  नाटक के शीर्षक से यह अंदाजा लगा 
ही लिया होगा किए एक हास्य रस प्रधान नाटक है|  पहले हम लोग  थोड़ी उलझन में थे की 
योग के मंच में हास्य रस प्रधान नाटक का मंचन उचित होगा  या नहीं परंतु जैसा कि बड़े बड़े
 कलाकार यह एक मत रखते हैं कि “हास्य एक बहुत ही गंभीर विषय है”, इसलिए हमने इसी 
विचार को आधार बनाकर योग जैसे गंभीर विषय को हल्के फुल्के तरीके से पेश करने 
का प्रयास किया है|
इस नाटक की प्रस्तुति के पीछे मनोरंजन की भावना तो है ही, पर साथ ही साथ हम यह भी 
चाहते हैं कि योग जैसे गंभीर समझे जाने वाले विषय को एक सरल और मनोरंजक तरीके से 
पेश किया जाए ताकि वह ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच पाए और उन्हें लाभान्वित कर पाए|
अंत में एक छोटी सी कविता के साथ हम नाटक का आरंभ करने की अनुमति चाहते हैं |
कविता का शीर्षक है “हास्य विषय गंभीर”
जब ई मनवा विचलित,
चिंतन होवे अधीर,
पाना चाही सुकुनवा,
जइसन  उड़ती चील !
तब मन ही मन का  छलने,
छोड़त सौ सौ तीर,
उनमे से एक आदि,
निसाना लगत  सटीक !
तब जाकर ई मनवा,
आवे  बाजन ढीठ   !
आऊर  लगाई ठाहाकवा,
भुलइके  सारी टीस !
ईका  न समझी तुम,
पका पकाया खीर,
कहत 'कबीर' ई ससुरा,
हास्य विसय गंभीर !
तो लीजिए पेश है आपके सामने योग रत्न बैच के स्टूडेंट के द्वारा रचित नाटक - “कचौड़ी योग”

दृश्य - 1
( इंदौरी लाल की एंट्री )
“ आज पोहे में सेव था कम,
जलेबी में भी लगा ना दम,
मिल जाए जो चटपटी कचौड़ी,
हो जाए दिन अपना बम बम बम बम … ! “
( इंदौरी लाल “कचौड़ी - कचौड़ी” कहते हुए इधर-उधर भटकता है और दुकानें तलाशता 
हैं |  सारी दुकानें बंद है |मन ही मन    बड़बड़ता है , “ आज अपना कचोरी खाने का योग 
बनता नहीं दिखता…|”
इंदौरी लाल “कचौड़ी - कचौड़ी” कहता हुआ इधर-उधर भटकता हुआ एक और चला जाता है ….. )
[ दृश्य 1 की समाप्ति ]



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                (दृश्य – 2)
{सिद्धेश्वर महाराज पेड़ के नीचे समाधि लगाए बैठे हैं |आसपास उनके कुछ चेले हैं}
चेला 1 : “ ना जाने सिद्धेश्वर  महाराज की तपस्या कब पूरी होगी? कितने वर्षों से उन्हें 
यूं ही ध्यान लगाए समाधि में बैठे देखा है| क्या लगता है, तब तक पूरी हो पाएगी 
महाराज की समाधि?
चेला 2 : “क्या कह सकते हैं भैया…? कहते है - ज्ञान योग तो प्रभु कृपा होने पर ही सिद्ध
 होता है…. योग न आए, तो चाहे बरसों माथा रगड़ों - कुछ हाथ ना लगे और जो 
उचित योग आ जाए, तो ज्ञान मिल जाए - इसी क्षण.. ! सब प्रभु कृपा पर ही निर्भर है…”
चेला ३ : बड़ा नाम सुना है, क्या होती है ये ‘प्रभु कृपा’ ?”
चेला 4 : अब क्या कह सकते है भैया - मध्य प्रदेश के वोटरों की मूड की ही तरह प्रभु 
कृपा भी कब, किसपे और क्यों हो जाए, ये  कोई नहीं  बता सकता…!”
{इसी क्षण   सिद्धेश्वर महाराज अपनी आँखें खोलते है औरे समाधि छोड़ कर खड़े हो जाते है… }
सिद्धेश्वर महाराज: “आज का दिन होगा प्रसिद्ध,
शेर सुनेगा, सुनेगा गिद्ध,
यम, नियम, ध्यान साध कर,
मेरी समाधि आज हुई है सिद्ध …|
छोड़ा घर, छोड़े सपने,
उन सबको छोड़ा, जो थे अपने,
मुक्ति - मोक्ष का मार्ग कठिन है,
पल-पल मन हरि दर्शन तरसे  ... |
ज्ञान का पूरा पिया है घूँट,
अनुभूति अन्दर अदभुत,
मिले मेरे ज्ञान का लाभ सभी को,
अब सिद्धेश्वर की बस यह सुध ... |”
(खबर फैल जाती है सिद्धेश्वर महाराज की समाधि पूर्ण हो गई है और उन्हें  सिद्धि प्राप्त 
हो गई है लोग एक-एक करके उनके दर्शन करने और अपनी समस्या बताने आने ल
गते हैं| पहले एक को  कुबड़ी धीरे धीरे उनके पास आती है|)
कुबड़ी : “बाबा जी को शत शत प्रणाम| हमसे तो ना चलते बनता है और ना ही ठीक से  
 खड़ा हुआ जाता है| अब  आप ही कुछ करिए बाबा ….”
(बाबा जी मंत्र पढ़ते हुए उसकी कमर पर हाथ फेरते हैं )
“ ह्राम , ह्रीम, ह्रौम,
भ्रांम, भ्रींम, भ्रौम,
श्राम, श्रीम, श्रोम, ….. ठांय… !”
(कुबड़ी स्वस्थ हो जाती है और  जय हो बाबा बाबा! आप महान हैं! बाबा जी की जय हो…” करते-करते खुशी से चली जाती है)
सिद्धेश्वर : “कल्याण हो! सबका साथ, सबका विकास! कल्याण हो…. !”
( एक व्यक्ति लगड़ाते हुए धीरे-धीरे बाबा की तरफ आता है)
लंगड़ा:  “मैं चाहता हूं एक कदम स्वच्छता की ओर,
मगर मेरे कदम ही है बड़े  बेडौल,
बाबाजी करो कृपा मुझ पर,
बन जाए मेरे पैर सुडोल”  
(बाबा जी उसके पैर पर मंत्र पढ़ते हुए हाथ फेरते हैं )
“ ह्राम , ह्रीम, ह्रौम,
भ्रांम, भ्रींम, भ्रौम,
श्राम, श्रीम, श्रोम, ….. ठांय… !”
(लंगड़ा भी स्वस्थ हो जाता  है और जय हो बाबा बाबा! आप महान हैं! बाबा जी की जय 
हो…” करते-करते खुशी से  चला जाता है)
सिद्धेश्वर: “मेरा नहीं, सब प्रभु का है, सब कुछ  प्रभु कृपा का ही कमाल है … “
(गीत शुरू)
“मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा है
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा है,
करते हो प्रभु तुम सब, मेरा नाम हो रहा है!
प्रभु आपकी कृपा से यह कमाल हो रहा है!
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा है |
पतवार के बिना ही, मेरी नाव चल रही है,
बिना मांगे ही ए मौला,  हर चीज मिल रही है,
अब क्या बताएं भगवन… - आराम हो रहा है..!
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा है,
करते हो प्रभु तुम सब, मेरा नाम हो रहा है
प्रभु आपकी कृपा से यह कमाल हो रहा है,
मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है….. |
( गीत समाप्त )
चेले : “अब बाबा जी के विश्राम का समय हो गया है |आप सभी अपनी अपनी समस्याएं 
लेकर कल पधारें.. जय हो बाबा जी की जय हो..|”
{सभी लोग धीरे धीरे चले जाते हैं और बाबा जी भी  एक छोटी सी कुटिया में विश्राम 
करने चले जाते हैं | दृश्य 2 की समाप्ति | }


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                                              ( दृश्य -३ )
( सिद्धेश्वर महाराज एकांत में विश्राम कर रहें हैं | उनका आत्मा चिंतन चल रहा है |
 गीत  शुरू ... )
“कोई उम्मीद बर नहीं आती,
कोई सूरत नजर नहीं आती|
हम वहां हैं जहां से हमको भी,
खुद अपनी खबर नहीं आती|
पहले आती हाले दिल पर हंसी,
अब किसी बात पर नहीं आती|
हमने  कोशिशें कर ली है लाखों,
दिल की बेकरारी नहीं जाती |
कोई उम्मीद बर नहीं आती,
कोई सूरत नजर नहीं आती ...|”
(गीत समाप्त | सिद्धेश्वर खुद से बात करते हुए ..)
“परम ज्ञान की जिज्ञासा थी, जब से मन में ठानी,
जाने कितनी पोथी पलटी, सब गुरुओं की मानी,
मिली सिद्धि, है मिली समाधि,  और मिला है ज्ञान,
फिर भी मन क्यों होता संशित, है कुछ और महान ?
लड़ा जगत से, लड़ा हूं खुद से, सोच सोच के हारा,
हाय! इन जिज्ञासाओं का है क्या कोई किनारा?
ब्रह्मांड जगत, तू है अदभुत, तेरे बहु बहु आयाम,
हे सनातन! हे अज्ञात! तुझ को मेरा प्रणाम !
प्रभु कृपा हो मिल जाए मेरे जीवन का निचोड़,
सब कुछ तूने छोड़ा है रे, अब इस हठ को भी छोड़ … |” (surrenders)
(एक लम्बा शंखनाद….  ‘अच्युतम केशवं’ गीत शुरू और उसके के साथ  इंदौरी लाल और
 कोरस का प्रवेश|
“अच्युतम केशवं कृष्ण दामोदरं, राम नारायणं जानकी वल्लभं || -2
कौन कहता है भगवान आते नहीं, तुम मीरा के जैसे बुलाते नहीं |
अच्युतम केशवं कृष्ण दामोदरं, राम नारायणं जानकी वल्लभं ||
कौन कहता है भगवान खाते नहीं, बेर शबरी के जैसे खिलते नहीं |
अच्युतम केशवं कृष्ण दामोदरं, राम नारायणं जानकी वल्लभं ||
याद आएगी मेरी कभी ना कभी प्रभु दर्शन तो देंगे कभी ना कभी
अच्युतम केशवं कृष्ण दामोदरं, राम नारायणं जानकी वल्लभं ||
(सिद्धेश्वर महाराज गीत की धुन में मस्त होकर रम जाते हैं और नाचने लगते हैं 
नाचते-नाचते इंदौरी लाल से टकराते हैं)
सिद्धेश्वर :  “कौन हैं ?”
इंदौरी लाल : “इंदौरी लाल, तू कौन है?”
( सिद्धेश्वर महाराज को अचानक हड़बड़ा जाते हैं और वापस गंभीर मुद्रा में आ जाते हैं)
सिद्धेश्वर: “तू मुझे ना पहचानता,
मैं शास्त्र वेदों का ज्ञाता,
समस्त भूत भविष्य का दर्शी,  
मैं परम सिद्ध,  मैं त्रिकालदर्शी
साधे योग के अंग हैं अष्ट,
साधना तप से हुआ हूँ हष्ट प्रष्ट
दूर करूंगा दुख तेरे बच्चा
बता मुझे तुझे क्या है कष्ट?”
इंदौरी लाल :  “पणभू!
अहो भाग मेरे  कि मिले हैं आप,
मगर मेरा है वर्तमान का संताप,
ना भूत ना भविष्य का लोभ,
बस आप बता दो  मुझको इतना,
क्या आज बनताहै मेरा कचौड़ी योग?”
सिद्धेश्वर: “अरे मूर्ख अरे अज्ञानी
अभी तक तू जिव्हा का दासी ?
जागो जागो साधो मन को,
यह सब लक्षण प्रलय के अधिकारी …|”
इंदौरी लाल : “कैसे साधूँ मन को पणभू …. (गीत शुरू )
मन चनचल
मन चनचल
मन चनचल
मन बड़ चनचल
रत जग जग, करत हरकत,
भटक इधर-उधर सब तरफ,
खटर पटर, चटर पटर सतत
मन चनचल
मन चनचल
मन चनचल
मन बड़ चनचल
हम कहत कहत थकत, मगर यह
समझत कब ?
समझत कब?
समझत कब…. ?
मन चनचल
मन चनचल
मन चनचल
मन बड़ चनचल |”
सिद्धेश्वर: “समभल! समभल! पल सनकत
परलय परलय पल सनकत
पल सनकत अब पल सनकत
परलय परलय पल सनकत
बच सक बच अब पल सनकत
मन चनचल - अब बच सक बच
अचरज अचरज मन चनचल?
अब हतभरत हतभरत  मन चनचल?
नटखत नटखट मन चनचल
अब मज चख
अब मज चख
अब मज चख अर मन चनचल |”
इंदौरी लाल : “मन चनचल
मन चनचल
मन चनचल
मन बड़ चनचल |”
सिद्धेश्वर: “अब मज चख
अब मज चख
अब मज चख अर मन चनचल!”

(इंदौरी लाल के पेट में जोरों से दर्द होता है और वो मूर्छित हो कर गिर जाता है |)

सिद्धेश्वर: “ और खा कचौड़ी इंदौरी लाल !   
   बिना योग के भोग, कराएगा तेरा दुःख से ही संयोग ...|”
(स्वयं से बडबडाता है )
“ वैसे पेट तो मेरा भी दुख रहा है – हँस हँस कर .... आनंद से .. ! और ये वो आनंद 
नहीं है, जो मैंने किताबों में पढ़ा है, ये कुछ वास्तविक और आतंरिक अनुभूति है...... ये
 इंदौरी लाल अज्ञानी जरूर है, मगर स्वाभिक, मनमौजी और सरल व्यक्ति है | 
अज्ञानियों में इससे बेहतर पात्र ढूँढना संभव नहीं लगता ...| पर
 ‘योग के बिना भोग, देगा तुमको केवल दुःख और रोग,
  हालत हो जाये बद से बदतर, इससे पहले संभालो सब लोग .. ‘
  जीवन-रस का भी स्वाद जरूरी, कराया इंदौरी ने यह अहसास,
  प्रसन्न हुआ मैं इसके सरल दर्शन से, मिल गया गुरु को शिष्य सुपात्र..|
  अब योग-भोग का fusion होगा, गूंजेगा चारों ओर ये नाद,
  ज्ञान मेरा इंदौरी को अर्पित, करता हूँ मैं इस पर शक्तिपात... !”
(सिद्धेश्वर शक्तिपात कर के इंदौरी को ज्ञान देता है, इंदौरी लाल धीरे-धीरे मूर्छा से 
उठता है .... )
इंदौरी लाल : “ गरम कचौड़ी चबाने को रहे सलामत दाँत,
और उसे पचाने को, रहे सलामत आँत !
खाऊँ, पियूँ, मस्त रहूँ, करूँ योग व भोग,
प्रभु कृपा से बना रहे मेरा - कचौड़ी योग !”
सिद्धेश्वर : (Surrenders ) पणभू!
 
{ ‘श्रीमन  नारायण’ भजन गीत और आसनों 

के साथ दृश्य एवं नाटक की समाप्ति }

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