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Monday, May 27, 2013

बाल-कविता : एक दो तीन चार .. !

बहुत दिनों से ड्राफ्ट में पड़ी हुई थी तो सोचा इसी से बिस्मिल्लाह किया जाए :)

१ २ ३ ४
शुरू हुई गिनती, राजकुमार !

५ ६ ७ ८
ग़म को मारो, जोर से लात !

९ १० ११ १२
तू मेरा प्यारा, राजदुलारा !

१३ १४ १५ १६
बता क्या था, मैंने बोला ?

१७ १८ १९ २०
और उस के, बाद इक्कीस !

२१ २२ २३ २४
शोर को अंग्रेजी  में noise !

२५ २६ २७ २८
बातें  करना nice nice   !


२९ ३० ३१ ३२
करते रहना हरदम कोशिश !

३३ ३४ ३५ ३६
पहलवान करता, रोज है वर्जिश !

३७ ३८ ३९ ४०
तगड़े  होगे, करना मालिश !

४१ ४२ ४३ ४४
चमकाओ  जूतें, करके पौलिश !

४५ ४६ ४७ ४८
कितनी अच्छी, होती बारिश !

४९ ५० ५१ ५२
राम ने वध किया था रावण !

५३ ५४ ५५ ५६
कितना प्यरा, होता बचपन !

५७ ५८ ५९ ६०
ख़ुशी से देना, जीवन काट !

६१ ६२ ६३ ६४
average हिंदी में हो औसत !

६५ ६६ ६७ ६८

भागी भैंस, देखी उसने लठ !

६९ ७० ७१ ७२

धीरे धीरे होते बेहतर !

७३ ७४ ७५ ७६
खुद को कभी, न समझो कमतर !

७७ ७८ ७९ ८०
कितनी प्यारी, मेरी बच्ची !

८१ ८२ ८३ ८४
नींद न पूरी, आए उबासी !

८५ ८६ ८७ ८८
हाथ में मूँह  , जो आए खांसी!

८९ ९० ९१ ९२
टॉफी लाला, की दुकान में !

९३ ९४ ९५ ९६
दोस्त आए, दोस्त के काम में !

९७ ९८ ९९ १००

गिनती ख़तम, अब खुश हो !

Sunday, December 12, 2010

विशुद्ध हास्य - आधुनिक कविता ( Hasya Kavita - Majaal )

!
ओं !
सुनो !
मजाल !
इसी तरह से,
बीच बीच में एंटर,
मार कर बन जाता है,
गद्य लेखन पद्य और फिर,
वो मुझे प्यार से कहती है की देखो,
ये है मेरी आधुनिक कविता !
ऊपर से नीचे तक देखता हूँ,
पढ़ता हुआ उसे, मगर,
समझ नहीं पाता ,
तो कह देता हूँ,
डिजाईन ,
अच्छा,
है !
!

Tuesday, December 7, 2010

शुद्ध हास्य-कविता - बच के कहाँ जाओगी रानी ! ( Hasya Kavita - Majaal )

बच के कहाँ जाओगी रानी !
हमसा कहाँ पाओगी रानी !
इतने दिनों से नज़र है तुझपे,
रोच गच्चा दे जाती है !
आज तो मौका हाथ आया है !
बस तुम हो और,
बस मैं हूँ, बस !
बंद अकेला और कमरा है !
इतने दिनों से सोच रहा हूँ,
अपने अरमां उड़ेल दूँ,
सारे तुझ पर ,
आज तू अच्छी हाथ आई है ! 

करूँगा सारे मंसूबे पूरे !
आज तो चाहे जो हो जाए,
छोड़ूगा नहीं,
ऐ सोच !
तुझे,
कविता बनाए बिना !!!

Tuesday, November 23, 2010

हास्य-कविता - ' मजेदार पहेली ' ( Hasya Kavita - Majaal )

बच्चा सोचे, कब इस बचपन से छुटकारा पाऊँ,
बूढ़े की ख्वाहिश, फिर से जो, बच्चा मैं बन पाऊँ !
गरीब देख ठाट साहब के, अपनी  किस्मत रोए,
साहब सोते देख गरीब को, 'चिंता गायब होवे !'
पौधा तरसे जाए,  कोई उसको डाले पानी,
कैक्टस जो गलती से गीला, याद करे वो  नानी !
औरत मुजरे सी सबको रिझाने वाली अदा चाहे,
मुजरे वाली से पूछो तो, बस एक मरद मिल जाए !
भोगी देख  योगी को सोचे मन काबू हो जाए ,
योगी मन  काबू करने में जीता जी मर जाए !

एक दूसरे को सब ताके, सोच के उनको पूरा ,
बिना ये जाने की दूसरा भी खुद को माने अधूरा !
मियाँ 'मजाल' देख के सबको जरा जरा मुस्काए,
मगर मामला, असल मसला उनके भी ऊपर जाए !
अनबूझी, अनसुलझी सी, लगे शाणी और कभी गेली,
जो भी हो पर है दिलचस्प - जिंदगी मजेदार पहेली !

Monday, November 15, 2010

शुद्ध हास्य-कविता - एक बार हुआ यूँ ..( Hasya Kavita - Majaal )

एक बार हुआ यूँ,
की ग़ालिब सोचे,
कुछ यूँ,
क्या हो अगर,
हो यूँ,
और न यूँ !!

अब जब ग़ालिब, 
सोचे यूँ,
तो हुआ यूँ,
की यूँ से मिला यूँ,
कुछ यूँ,
की पता न चला,
ये यूँ, यूँ,
या ये यूँ, यूँ  !!
 
क्योंकिं,
ये यूँ,
ही है,
कुछ यूँ,
की जो सोचने लगो,
यूँ या यूँ,
तो,
यूँ ही यूँ में, 
निकलते जाते,
यूँ पे यूँ !
यूँ पे यूँ !!


ग़ालिब पहले परेशान,
यूँ,
या,
यूँ !
अब नई परेशानी,
की ये यूँ, यूँ,
या ये यूँ, यूँ  !!

चेहरा-ए-ग़ालिब,
कभी यूँ,
और,
कभी यूँ !!

इसलिए कहे 'मजाल',
ग़ालिब,
आप सोचे ही क्यूँ,
 यूँ ? !!!

Wednesday, November 10, 2010

' कलाकारी !' : हास्य-कविता, ( Hasya Kavita - Majaal )

हमारे मित्र,
देखने प्रदर्शनी चित्र,
दिन रविवार,
सपरिवार.

सामने चित्र,
स्थिति  विचित्र,
मित्र सोचे, 'वाह ! क्या चित्रकारी ! ',
उनकी बीवी सोचे, 'वाह ! क्या साड़ी ! '
छोटा बच्चा सोचे, ' वाह ! क्या गाड़ी ! '
बड़ा वाला सोचे, ' वाह ! क्या नारी !'

एक ही दुनिया में,
मौजूद रंग कितने,
है सबने पाई,
अपनी अलग नज़र, 
अपनी अपनी समझदारी.
बनाने वाले ने खूब बनाई,
तस्वीर-ए-बेमिसाल,
दाद दीजिये 'मजाल',
ऊपरवाले की कलाकारी !

Monday, November 8, 2010

हास्य-कविता : ' पगार ! ' ( Hasya Kavita - Majaal )

अरसे पहले मुंशी प्रेमचंद साहब के किसी उपन्यास (या शायद मानसरोवर) में पगार की ये परिभाषा पढ़ी थी. उसी को कुछ कवितानुमा कर दिया है :

महीने की,
पहली तारीख को,
कितनी अच्छी,
लगती थी तुम,
मेरे हाथ में,
पूरी की पूरी !
गोया,
तुम और मैं,
बने है,
सिर्फ,
एक दूसरे के लिए,
पूरे के पूरे !
एक अनकहा वादा था,
साथ निभाने का,
पूरे महीने भर का !
मगर तुम,
ऐ नाज़नीन !
निकली बेवफा,
उस पूनम के चाँद की तरह,
जो होता चला गया,
कम,
रोज़ ब रोज़,
और गायब हो गयी तुम,
बीच महीने में,
पूरी तरह से,
मेरा साथ छोड़ कर,
चाँद की तरह !
अब मैं बैठा हूँ,
तन्हा !
खाली मलते हुए,
अपने हाथ,
और,
मेरे सामने बचा है,
काटने को,
आधा महीना,
पूरा का पूरा !

Friday, November 5, 2010

हास्य : कमेन्ट कर न कर पर कमबख्त, हाज़िरी तो लगाते जा !

अब जब आया ही गया है महफ़िल-ए-ब्लॉग में,
तो कोई निशानी तो छोड़ जा,
कमेन्ट न कर चाहे,
पर कमबख्त,
कम स कम,
हाज़िरी  तो लगा !

पोस्ट-ए-ब्लॉग को,
सींचा  है मेहनत से,
'मजाल' ये वो बाग़ है,
गुल-ए-कमेन्ट की महक से,
होता जो है रोशन ,
टिप्पणियाँ ही करती जिसे आबाद है !
चलेगी मजालिया तुकबंदी और,
सुमन  का 'nice' भी चलेगा,
चलेगी तेरी मर्जी,
हमे कोई  choice भी चलेगा !

कुछ न सूझे तो मुस्कारा के यूँ ( ; )
हौसला अफसाई ही कर दे,
तादाद ही बढ़ा !
जश्न में शरीक न हो न सही,
मगर कमबख्त,
कम स कम, 
ताली तो  बजा !

पसंद आये न आए,
टिकट तो कटवा ही चुका है !
फिल्म तो देख ही ली है पूरी,
पैसे तो गँवा ही चुका है !
किस्सा तो ख़तम होना ही था,
ऐसे या वैसे,
इन्टरनेट में नहीं लगते तो ,
तो कहीं और खर्च होते पैसे !
अब मातम मानने से तो अच्छा है,
फीका ही मुस्कुरा !
फीकी हँसी भी असर करेगी कमबख्त !
तू एक बारी तबीयत तो बना !

अब जब आया ही गया है महफ़िल-ए-ब्लॉग में,
तो कोई निशानी तो छोड़ जा,
कमेन्ट न कर चाहे,
पर कमबख्त,
कम स कम,

हाज़िरी  तो लगा !

Thursday, November 4, 2010

' कविताई ! ' : हास्य-कविता

वो, जिसे कहते है कविताई,
बनाने वाले ने,  ऐसी बनाई,
की सीधे समझ आई तो आई,
और जो न आई, तो  न आई !

जिसको ये न समझ में आई,
न समझा सकती उसे पूरी खुदाई,
चाहे भरकस जोर लो लगाईं, 
हर प्रयास विफल हो जाई,
क्योकि वो कहेगा ' भाई,
हमको एक बात दो समझाई ,
हमरे पिताजी के बस छोटे भाई,
नहीं उनका कोई बड़ा भाई,
तो फिर इसको होना चाही,
कविचाची, और न की कविताई ! '

इसलिए हम कहते है पाई ,
खेल ये दिमागी नहीं है साईं,
इसलिए छोड़ो मगज खपाई, 
न समय  की करों यूँ गवाई,
अगर अब भी बात न समझ आई,
तो छोड़ो मुई को, आगे बढ़ो भाई,
है और भी ग़म, जमाने में भाई ,
 उनको ही  लो आजमाई !

जहां  तक 'मजाल'  का सवाल हाई ,
तो हम वापस देतें  दोहराई ,
की वक़्त ही वक़्त कमबख्त है भाई,
क्या कीजे, गर न कीजे  कविताई ....  !

Tuesday, November 2, 2010

हास्य-कविता : आप से तू, और फिर तू से गाली में, आ गए आखिर, साहब अपनीवाली में !

आप से तू और फिर,
तू से गाली में,
आ गए आखिर,
साहब अपनीवाली  में !

भेद नहीं करते वो,
साली और घरवाली में,
कितनी ही बार पाए गए,
पी कर टुन्न  नाली में !

सीखे है सारे ऐब,
उन्होंने उम्र बाली में,
छूटे है जेल से,
सरकार  अभी हाली में !

समझ लीजिये लगे हुए है,
कोई काम जाली में,
इतनी जल्दी  नहीं होता ,
सुधार हालत माली में !

क्या इल्म देंगे आप  उन्हें,
हिंदी या बंगाली में,
फर्क ही नहीं जिन्हें,
ग़ज़ल और कव्वाली में !

काटें ही उगने है जनाब,
बबूल की डाली में,
माहौल चाहे  श्राद्ध हो,
या फिर  दिवाली में ?!


बस  चट्टे बट्टे ही नहीं,
भरे है थाली में,
शरीफ भी है बचे हुए,
इस बस्ती मवाली में,
जिमेदारी को अपनी,
समझिए 'मजाल',
चुनाव नहीं होते है,
यूँ ही बस खाली में !

Sunday, October 31, 2010

हास्य विषय गंभीर !

जब ई मनवा विचलित,
चिंतन होवे अधीर,
पाना चाही सुकुनवा,
जइसन  उड़ती चील !
मति ही मति का ठेंगा,
दिखाईने छोड़त सौ तीर,
उनमे से एक आदि,
निसाना लगत  सटीक !
तब जाकर ई मगजवा,
आवे  बाजन ढीठ   !
आऊर  लगाई ठाहाकवा,
भुलइके  सारी टीस !
ईका  न समझी तुम,
पका पकाया खीर,
कहत 'मजाल' ई ससुरा,
हास्य विसय गंभीर !

राँझा मिलन न हीर ?
फुटवा गया तकदीर ?
काहे शोक मनावत,
जीवन की बाकन रील,
कभी सलमान दबंगवा,
कभी पीटत  हई वीर !
जीवन जइसन अमवा,
चीजन  ई खट मीठ !
जब ई आवत समझवा,
मज़ाक बनत  पेचीद !
तब जाकर ई मनवा,
छोड़त  तनना फीर,  
अऊर  इस तरहवा,
तनाव  पावत  ढील !
कहत 'मजाल' ई ससुरा,
हास्य विसय गंभीर !

Wednesday, October 27, 2010

' इश्कियापन्ती ' : हास्य-कविता ( Hasya Kavita - Majaal )

तुझे पाने की हसरत लिए,
हमें एक जमाना हो गया !
नयी नयी शायरी,
करते तेरे पीछे,
देख मैं शायर कितना,
पुराना हो गया !

मुए इस दिल को,
संभालना पड़ता है,
हर वक़्त !
दिल न हुआ गोया,
बिन पजामे का,
नाड़ा हो गया !

मरज में न फरक,
तोहफों में खरच अलग !
इलाज में  खाली सारा,
अपना  खज़ाना हो गया  !

दिल दर्द से भरा,
और जेबें खाली !
ग़म ही इन दिनों,
अपना खाना हो गया !

मुद्दतें हो गयी ,
रोग जाता नहीं दिखता,
अस्पताल ही अब अपना,
ठिकाना हो गया !

तू भी तो बाज़ आ कभी ,
इश्कियापन्ती  से 'मजाल'
पागल भी  देख तुझे,
कब का सयाना हो गया !

Friday, October 22, 2010

' लंगोटिया यार ! ' : हास्य-कविता ( Hasya Kavita - Majaal )

एक थे लम्बूद्दीन 'लंब',
हम कहते नहीं है दंभ,
थे वो इस कदर लंबे,
पाँव जैसे खंबे !
हाथ जैसे कानून,
ये लंबे, ये ssss लंबे !

एक थे मोटूराम  'मोटी',
हम देतें नहीं गोटी,
तोंद उनकी ये मोटी,
ये ssss भयंकर  मोटी,
की  साक्षात 'मोटा' शब्द,
उनके समक्ष  लगता था दुबला !
हर तबीयत, हर तंदरुस्ती,
उनके सामने थी खोटी !

'लंब' और 'मोटी' मिले जिस दिन,
ज्ञानी  जन  कहते है की उस दिन,
नक्षत्रों का बना विचित्र योग ,
ऐसा संयोग अत्यंत दूभर,
आंकड़े ऐसे , परे  सब मति,
यदा कदा, सदियों में, होती ऐसी युति.

हुआ लंब और मोटी का मिलन जब ,
धरे के धरे रह गए, सारे तर्क विज्ञान,  सब ज्योतिषी,
व्याकरण रह गया ताकता फटी आँख ,
संधि  के नियमों को पहना दी गयी टोपी ,
'ब' और 'मो' मिलकर  हुआ 'गो'
लंब 'धन' मोटी बन गया 'लंगोटी' !

यारी दोनों  की चढ़ी वो परवान,
की नीचे रह गए सारे वेद कुरान ,
उठी इंसानियत, बन कर सरताज,
नयी दिशा, जीवन का नया आगाज़,
बस प्रेम बना सत्य अंतिम ,
बाकी सब बातें बेकार,
और शुरू प्रचलन नया  मुहावरा,
तू  है मेरा 'लंगोटिया यार' !

Wednesday, October 20, 2010

हास्य-कविता : ' उर्दू शायरी की तरह तुम, प्रिय ! ' ( Hasya Kavita - Majaal )

क्लिष्ट !
गूढ़ !
उलझी हुई !
मुश्किल !
पेचीदा !
मगर दिलचस्प !
उर्दू शायरी की तरह तुम, प्रिय !
समझ में तो,
कम ही आती हो,
मगर,
पढ़ने  में तुम्हें ,
मज़ा बहुत आता है !
कुल मिला कर,
कुछ खास,
पल्ले तो नहीं पड़ता,
मगर,
कोशिशों में,
समझने के,
प्रयासों में तुम्हें,
वक़्त तुम्हारे साथ,
अपना  खूब कट जाता है !

उर्दू शायरी की तरह तुम,
प्रिय !

Monday, October 18, 2010

' काण्ड !' : हास्य-कविता ( Hasya Kavita - Majaal )

'आपकी रचना की तिथि अगस्त ,
और मेरी  वाली की,
महीना जुलाई है,
परवाना  होता है,
 शमा में भस्म,
ये बात मैंने आपसे,
पूरे एक महीना पहले,
पता लगाई है...'

मैंने देखा,
जनाब सामने खड़े थे,
सेहत सींकिया ,
पर तेवर पहलवानी,
चहरे पे छाया था,
मातम नाकामयाबी,
कारण भी साफ़ सा,
दीखता था आसानी,
की हुनर फुटपाथिया,
पर ख्वाब आसमानी !
लड़ने का मूड है,
जता चुके थे,
समझ कितनी रखते खुद की,
खबर कितनी दुनिया की,
परवाने का उदाहरण देकर,
बता चुके थे !
'ये  खूब रही की आपकी,
और हमारी सोच मिल पाई,
नहीं तो इसने कब,
किसी से लम्बी निभाई ?
कभी आपके पास गयी,
कभी हमारे पास आई,
सोच चीज़ ही तवायफ,
किसकी सच्ची लुगाई ?!
अब मिलें है किस्मत से हम,
तो खुशियाँ मनाइए,
लगिए गले,  कीजिये ख़त्म ,
बात क्यों आगे बढ़ाइए ? ..'

 'बात को यूँ,
 हलके में न लीजिये,
गर चोरी करने की,
 रखते है 'मजाल',
तो कबूल करने के,
हौसले भी साथ रखिये ,
आप तो बात से,
साफ़ मुकर जातें है,
ऊपर से सोच की,
खिल्ली उड़ातें   है,
नहीं सीखा क्या आपने,
कदर-ए-हुनर करना,
माँ-बाप से क्या,
यहीं संस्कार पातें है .. ?'

अब यूँ तो 'मजाल',
सीधा-सच्चा प्राणी,
न छुए शराब,
न ताके नारी,
पर जो बात पहुँच जाए खानदानी,
फिर तमीज गयी तेल लेने,
शरम भरने पानी !
भूल जाए मियाँ  'मजाल' तब सब कुछ,
और दिखा  दें फिर जात,
 शायराना अपनीवाली   !

' भाई हम तो बजा ही फरमा  रहे है,
तेवर तो आप ही  दिखा रहे है,
अब  खानदान का जिक्र,
कर दिया तो सुनिए,
'मजाल' आपको,
पूरी कहानी सुना रहे है'

'माँ-बाप ने तो बताया,
हमने बस इतना,
की बेटा 'मजाल',
आदमी चीज़ है अदना,
खुदा ने पूरी दुनिया,
चुपचाप बनाई,
बिना जिक्र छेड़े,
बिना दिए दुहाई,
पर आदमी की हजूर,
क्या कहिये तबीयत !
जरा कुछ हुआ नहीं,
की बात तेरे-मेरे पर आई !
जो ऊपर वाला किसी दिन,
आ गया हिसाब मांगने  पे,
तो लूट जाएगी पूरी सल्तनत
निभाने में,
रस्मों मूंह दिखाई !
इसलिए मेरे भाई,
छोड़ो  ये खांमखां  की लड़ाई,
बनाया उपरवाले ने सब कुछ ,
न लगी आपकी कुछ ,
न मेरी कमाई !'

'व्यर्थ की बातें न बनाइये,
ऊपर वाले को बीच में न लाइए,
इलज़ाम लगा है आप पर,
बात को उससे आगे न बदाइए
सीधे कबूलें चोरी तो बेहतर,
नहीं तो हमसे,
कानूनी नोटिस पाइए '


'हद करतें है साहब !
क्या कहना चाहतें है आप ?
क्या ब्रम्हा  ने ये रचना,
सबसे पहले क्या,
 कानों में आ कर सुनाई थी ?
आपको क्या लगता है,
पहले प्रेम की बाती,
क्या आपने जलाई थी ?
आपसे पहले किसी को सूझी नहीं ?
परवाने की शहादत परंपरा,
अपने घर से  शुरू करवाई थी ?!
सदियों से चल रही है ये बात,
हज़ारों बार हो चुका है ,
इस्तेमाल हर जज़्बात,
मौलिक तभी तक चीज़ कोई ,
जब तक की उसका,
स्रोत न हो ज्ञात !
अभी भी कोई भरम है,
तो मुगालातें दूर करवाता हूँ,
थोड़ी महोलत  दीजिये नाचीज़ को,
अभी दो मिनट में अंकल गूगल से ,
आपकी बाकी सारी रचनाओं की,
'प्रेरणाओं' का भी पता लगाता हूँ !'

' अरे अरे !
कहाँ चले ?!
कानूनी नोटिस तो देतें जाइए !
हमें  भी तो चले पता,
आखिर क्या होती है सख्ती !
सहीं कहते है आप जनाब,
चुराई  ही होगी,
क्यों आप जैसों से,
अपनी सोच तो,
यकीनन  नहीं मिल सकती .. ! '

Saturday, October 2, 2010

लाल बत्ती, हरी बत्ती - हास्य कविता ( Hasya Kavita - Majaal )

लाल बत्ती पर हमारी गाड़ी रुकी हुई थी,
सामने थी एक हसीना,
नज़रे उसी पर गढ़ी हुई थी,
थोड़ी महोलत थी, तो निभा रहे थे,
अधूरे ही सही, दिल में मंसूबे बना रहे थे !

तभी पीछे से एक स्कूटी वाला आया,
कट मारा ऐसा,
खुदा ने ही  बाल बाल बचाया,
हमने देखा आसमान की तरफ,
तो मानो सूरज मुस्काया,
"क्यों बच्चू, और टापेगा? अब मज़ा आया ?!"

पट्ठे को शायद, कुछ ज्यादा ही जल्दी थी,
जरूरत से ज्यादा जोश दिखाया.
न देखा आव, न ताव ,
पूरी रफ्त्तार में स्कूटी  भगाया,
आगे बत्ती  पर रुका था एक पहलवान मुस्टंडा,
उसको टकराके, गिराते हुए,
स्कूटी  वाला  भाई, आगे निकल आया !

पहलवान भाई पहले संभाला, फिर गुर्राया,
"ओं तेरी की ! रूक !", पूरी रफ़्तार से,
अपनी फटफटिया को, स्कूटी के पीछे दौड़ाया,
पीछा कर उसको दबोचा, और जड़ दिया घूँसा,
स्कूटी  वाले जनाब को, उनके  हेलमेट  ने,
जहाँ तक संभव हो सका, बचाया !

बाईक  पटकी एक तरफ फिर,
और गालियों का ताँताँ  लगाया,
एक से बढ़  के एक चुनिन्दा सुनाई,
गोया मस्तराम ने ग़ालिबाना अंदाज़ पाया !

अब एक तरफ सीकिये की सिफारिश ,
दूसरी तरफ पहलवान की बदले की रट,
एक तरफ पिद्धि स्कूटी,
दूसरी तरफ भयंकर बुललल्लट !
हमने सोचा, आज तो लग गयी,
स्कूटी वाले भैया की नैया  तट !

सब लोगों की उत्सुकता भी बढ़ गयी थी,
मुफ्त की फिल्म थी, सबने  टिकट कटवाया !
पर बेचोरों का मज़ा किरकिरा हो गया,
जोहीं स्कूटी वाले ने अपना हेल्मट हटाया,
" ओए  बिट्टू तू !!! ", स्कूटी वाला चिल्लाया !
कमबख्त   किस्मत हो तो ऐसी,
बुलटिया पहलवान सींकिया का,
पुराना लंगोटिया निकल आया !

अब तो नजारा ही बदला हुआ था,
प्यार की प्यार उमड़ रहा था,
पहलवान का चेहरा ख़ुशी और शर्मिंदगी के,
विचित्र मिश्रण से चमक रहा था !

शर्मिंदगी कुछ ज्यादा पनपती दिखी,
शायद सोच रहा था,
भाई पे खांमखां हाथ उठाया,
जो कर लेता थोडा इंतज़ार,
तो बला खुद ब खुद टल जाती,
कितनी देर टिकती आखिर,
गुस्से की लाल बत्ती,
थोडा सब्र करते 'मजाल' ,
तबीयत और बत्ती,
दोनों अपने आप हरी हो जाती !

जिंदगी के अन्दर एक अजीब सी  बेकरारी है,
अन्दर घुटती है, बेकाबू हो जाती है,
जो लगता प्यार,  और कभी दिखता  है फसाद,
वो दरअसल है,
फ़क्त,
दबी हुई खवाहिशें जिस्म की ,
जो बाहर आना चाहती हैं,
जीना चाहती है खुद को,
थोड़ी ताज़ी हवा खाना चाहती है   ....

इसलिए कहते है जनाब,
जिंदगी को जरा करीब से आजमाइए,
हर पहलवान में, छुपा है एक 'बिट्टू',
उसको जरा उभार कर लाइए !
गोली मारनी है तो, मारिये  फसाद को,
और सुकूँ की ताउम्र कैद का लुत्फ़ उठाइये !

तो सौ बात की एक बात,
जब हो अरमानों की तादाद,
और तय न कर पाएँ आप,
बीच प्यार या फसाद,
तो गले मिलिए हजूर,
कीजिये खाक रंजिश को,
नतीजा 'मजाल',
सोचते रहिएगा बाद !

Friday, October 1, 2010

'यूँ बेहतर ! यूँ बेहतर !' - हास्य कविता ( Hasya Kavita - Majaal )

ज्यादा खाने से तो,
थोड़ा कम बेहतर,
खाना कम बेहतर,
की हज़म बेहतर !
कभी कभी खाना,
भी ग़म बेहतर,
ग़म बेहतर पर,
न हरदम बेहतर!

है वो बेहतर,
या मैं बेहतर ?
वो भी अच्छा,
पर हम बेहतर !
बेहतर-ए-बेहतरीन से,
भरी है महफ़िल,
तुकबंदी में मगर,
हम भी न कम बेहतर !

पहले अच्छा और,
फिर उससे बेहतर,
धीरे धीरे ही बनते,
सबसे बेहतर.
अब सबसे बेहतर भी,
यूँ तो क्या बेहतर (?)
की जो सोचने लगे,
'अब क्या इससे बेहतर ?!' 

जो हम बेहतर,
तो है बेहतर,
जो  वो बेहतर,
तो क्यूँ  बेहतर ?!
जिंदगी और शायरी  की,
एक सी हालत 'मजाल',
नज़र पड़ी जो आज,
' कि यूँ बेहतर ! कि यूँ बेहतर ! ' 

Thursday, September 30, 2010

बुरे फँसें 'मजाल' आ कर जन्नत में - हास्य कविता

जो थोड़ा  हेर फेर हो जाए कागजों में,
सभी अपने कर्म दुरुस्त करवा रहे है,
की उनकी भी पक्की हो जाए जन्नत,
चित्रगुप्त  को सभी पटा रहे है !

अंदर इन्द्र देव भाईलोगों से अपने,
आज का चढ़ावा गिनवा रहे है,
हफ्ता न पहुंचे  जब तक  सेवकों  का,
प्रभु कहाँ  बारिश करवा रहे है ?!

आगे सब नेताओं की टोली इकट्ठी,
मानो परम बोधी ही पा  रहे है,
'की यूँ नहीं यूँ, ये दरअसल यूँ',
नारद मुनि सबको सुलगा रहे है !

नीचे सिखाते थे तो जो 'नेति, नेति',
अप्सराओं को देख कह रहे 'देती क्या ? देती ?'
आँखें गर करती है, हाल-ए-दिल बयाँ तो ,
सब संत बड़े खूँखार नजर आ रहे है !

ये भी खूब रहीं मियाँ 'मजाल',
हाल यहाँ के  तो है कमाल,
ऊपर से तुर्रा  ये, की जो भी मरें,
कमबख्त सब स्वर्ग  ही जा रहे है !

गौर  करें कोई हमारा भी तर्क,
कब तक बचा रह पाएगा ये स्वर्ग ?
की धुरंधर सारे, सभी महानुभावी,
तो यहीं का टिकट  कटवा रहे है !

दूर से देखने पर तो यही लगता था,
'वाह ! वहाँ क्या मज़ा होता होगा !'
बुरे फँसें 'मजाल', आ कर जन्नत में,
हमने तो सोचा था, कुछ नया  होता होगा !

Monday, September 27, 2010

'अब मज चख ! ' - बिना मात्रा की हास्य कविता !

यह मन चनचल !
भगत इधर उधर,
सब तरफ,
हर वखत !

रत जग जग,
करत सब करतब,
उपदरव ,
बस न पढ़त  !

हम कहत कहत थक,
मगर  यह,
समझत कब ?
 
समभल  !
अब पल सनकत !
बच सक बच !
हमर ब्रह्म अस्त्र !
कल प्रशन पत्र !

अचरज ?
अब हतभरत ?!
नटखट !
अब मज चख !   

Saturday, September 25, 2010

' यूँ ! ' - शायरी करने का नुस्ख़ा (हास्य कविता) ! ( Hasya Kavita - Majaal )

वो पूछते है हमसे,
शायरी करने का नुस्ख़ा,
वाकिफ तो हम मगर,
उन्हें समझाएँ  कैसे,
" कि ' यूँ ' ! "

लफ़्ज़ों से ज्यादा,
मायने रखता है लहज़ा,
कि आप कहे " ऐसे ",
और हम कहें,
" कि ' यूँ ' ! "

कभी कभी एक बात के,
मतलब निकले कई,
कि हमने कहा " वैसे "
और वो समझें,
" कि 'यूँ' ! " 

हो खुदा भी परेशान,
कमबख्त क्या कह गया ?!
ऐसी शायरी भला,
जनाब करें क्यूँ ?

बाद हफ्ते देखो और,
सोचो  ' लिखा ही क्यों ? '
'मजाल' लिखिए जरूर,
मगर न लिखिए ' यूँ ! '  
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