Monday, November 8, 2010

हास्य-कविता : ' पगार ! ' ( Hasya Kavita - Majaal )

अरसे पहले मुंशी प्रेमचंद साहब के किसी उपन्यास (या शायद मानसरोवर) में पगार की ये परिभाषा पढ़ी थी. उसी को कुछ कवितानुमा कर दिया है :

महीने की,
पहली तारीख को,
कितनी अच्छी,
लगती थी तुम,
मेरे हाथ में,
पूरी की पूरी !
गोया,
तुम और मैं,
बने है,
सिर्फ,
एक दूसरे के लिए,
पूरे के पूरे !
एक अनकहा वादा था,
साथ निभाने का,
पूरे महीने भर का !
मगर तुम,
ऐ नाज़नीन !
निकली बेवफा,
उस पूनम के चाँद की तरह,
जो होता चला गया,
कम,
रोज़ ब रोज़,
और गायब हो गयी तुम,
बीच महीने में,
पूरी तरह से,
मेरा साथ छोड़ कर,
चाँद की तरह !
अब मैं बैठा हूँ,
तन्हा !
खाली मलते हुए,
अपने हाथ,
और,
मेरे सामने बचा है,
काटने को,
आधा महीना,
पूरा का पूरा !

10 comments:

निर्मला कपिला said...

चलो कैसे भी सही उसकी अहमियत तो समझ आयी। शुभकामनायें।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

अच्छी और सही परिभाषा है..

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

:) :) आधा महीना ..पूरा का पूरा ...सही है ..

Majaal said...

आप सभी का प्रतिक्रियाएँ देने के लिए आभार ....

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 09-11-2010 मंगलवार को ली गयी है ...
कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

दिगम्बर नासवा said...

कम से कम आधा महीना तो पार हो गया ... कहीं कहीं तो ये दो दिन भी नहीं ठहरती ....
अच्छा हास्य है ... .

mahendra verma said...

कविता भले ही हास्य वाली हो लेकिन इसमें साहित्यिकता भी भरपूर है।

Shah Nawaz said...

:-)

बेहतरीन!


प्रेमरस.कॉम

ali said...
This comment has been removed by the author.
ali said...

उधार के खुमार के उतार सी पगार !
सोलहवां चढ़े हुए बुखार सी पगार !!

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