Monday, September 27, 2010

'अब मज चख ! ' - बिना मात्रा की हास्य कविता !

यह मन चनचल !
भगत इधर उधर,
सब तरफ,
हर वखत !

रत जग जग,
करत सब करतब,
उपदरव ,
बस न पढ़त  !

हम कहत कहत थक,
मगर  यह,
समझत कब ?
 
समभल  !
अब पल सनकत !
बच सक बच !
हमर ब्रह्म अस्त्र !
कल प्रशन पत्र !

अचरज ?
अब हतभरत ?!
नटखट !
अब मज चख !   

2 comments:

alka sarwat said...

मुबारक बाद
साधुवाद
बहुत मेहनत की है आपने
वाकई बेहतर प्रयास

ali said...

पहली ही टिप्पणी मात्रा वाली आ गयी तो मान लिया कि ये बंधन टिप्पणीकारों पर लागू नहीं है :)

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