Wednesday, September 15, 2010

बिना मात्रा की कविता .. !

नयन जल भरत,
टपक टपक बहत,
हरदय करत दरद,
अनवरत !

सब कहत,
वह बस - अप गरज,
पर,
यह मन,
न सहमत !

करत नटखट वह,
हम फसत !

हम कहत कहत थकत,
यह मगर, हठ करत,
बस खट -पट , खट- पट,
सतत !

हर बखत,
बस यह रट,
"दरसन ! दरसन !"

बस एक झलक,
फकत,
कमबखत !

4 comments:

ZEAL said...

बहुत बढ़िया लिखा है...पिछली पोस्ट बहुत अच्छी लगी...आभार।

नीरज गोस्वामी said...

अद्भुत और सार्थक प्रयोग...आनंद आया पढ़ कर...वाह...
नीरज

मो सम कौन ? said...

बिना मात्रा की टिप्पणी:
----------------

अजब, गजब, जबरदस्त।

और जनाब, ये वर्ड वैरिफ़िकेशन हटा दीजिये, मेहरबानी होगी।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुन्दर ...अद्भुत

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