Sunday, September 26, 2010

व्यंग्य कविता - फ़सादियों से बच कर रहना 'मजाल', अकारण आक्रांत हो जाओगे !,

वक़्त रहते शांत हो जाओ वर्ना,
रक्त बहते शांत हो जाओगे !
फ़सादियों से बच कर रहना 'मजाल',
अकारण आक्रांत हो जाओगे !

सोच हो जाएगी  इतनी छोटी,
खुद में भी समां न पाओगे,
होगे दुनिया से देश और फिर,
देश से प्रांत हो जाओगे !

कैसे दोगे दिशा स्वयं को,
मत से जो  भ्रांत हो जाओगे ?
फ़सादियों से बच कर रहना 'मजाल',
अकारण आक्रांत हो जाओगे !

बह जाओगे जो भावनाओं में,
तुम्हारी मारी जाएगी मति,
मारी गयी  मति एक बार ,
तो  समझो समीप  दुर्गति !
करेंगे खता बस कुछ लम्हों,
पर  भुगतेगी पूरी सदी,
और तुम जीवन-पथ-मध्य में ही,
आजीवन दुखांत हो जाओगे !
फ़सादियों से बच कर रहना 'मजाल',
अकारण आक्रांत हो जाओगे !

साँप का बच जाए एक बारी,
न बचे कोई इनका काटा,
इस दुनिया को जन्न्हुम  कर ,
जन्नत उस दुनिया का वादा !
बेतुके दावों  पर करके अमल,
क्या  ज्ञाता   वेदांत हो जाओगो ?!
फ़सादियों से बच कर रहना 'मजाल',
अकारण आक्रांत हो जाओगे !

खुदा को न देखा किसी ने,
और न ही देखेगा कोई,
कितने मरे नाम पे उसके,
क्या गिनती है कोई ?
देख हाल ये  मनुष्यता का,
नयन ये कितना रोई.
अजात की खोज में हाय री !
ज्ञात   की क्या गत होई !
नैतिकता का चीर हरण कर,
खूब सभ्रांत कहलाओगे !
फ़सादियों से बच कर रहना 'मजाल',
अकारण आक्रांत हो जाओगे !

6 comments:

मो सम कौन ? said...

मज़ाल भाई,
मस्त लिखा है।
पहली पंक्ति में तो को हो पढ़ रहा हूँ, ज्यादा मुफ़ीद लग रहा है।
गुस्ताखी माफ़।

Majaal said...

सही पढ़ रहे है जनाब, कुछ हमारे ऐनक का ही ऐब समझ लीजिये , अभी दुरुस्त कर देतें है ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

अपरोक्ष रूप से सीख देती रचना ..

अनामिका की सदायें ...... said...

हमेशा की तरह सटीक व्यंग्य .

ali said...

फसादियों / उन्मादियों से आगाह किया ! खतरा बड़ा है ! अच्छा किया आपने !

निर्मला कपिला said...

फ़सादियों से बच कर रहना 'मजाल',
अकारण आक्रांत हो जाओगे !
बिलकुल सही सन्देश दिया है। शुभकामनायें

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