Sunday, October 31, 2010

हास्य विषय गंभीर !

जब ई मनवा विचलित,
चिंतन होवे अधीर,
पाना चाही सुकुनवा,
जइसन  उड़ती चील !
मति ही मति का ठेंगा,
दिखाईने छोड़त सौ तीर,
उनमे से एक आदि,
निसाना लगत  सटीक !
तब जाकर ई मगजवा,
आवे  बाजन ढीठ   !
आऊर  लगाई ठाहाकवा,
भुलइके  सारी टीस !
ईका  न समझी तुम,
पका पकाया खीर,
कहत 'मजाल' ई ससुरा,
हास्य विसय गंभीर !

राँझा मिलन न हीर ?
फुटवा गया तकदीर ?
काहे शोक मनावत,
जीवन की बाकन रील,
कभी सलमान दबंगवा,
कभी पीटत  हई वीर !
जीवन जइसन अमवा,
चीजन  ई खट मीठ !
जब ई आवत समझवा,
मज़ाक बनत  पेचीद !
तब जाकर ई मनवा,
छोड़त  तनना फीर,  
अऊर  इस तरहवा,
तनाव  पावत  ढील !
कहत 'मजाल' ई ससुरा,
हास्य विसय गंभीर !

3 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

गुड़.

ali said...

आपसे सहमत हूं ! हास्य सृजन कोई आसान बात नहीं !

Majaal said...

आप लोगों का ब्लॉग में पधारने के लिए आभार ....

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