जैसे बीते है पिछले बरस, वैसे ही हो आगे सरस,
मिला जुला कर लगभग यही, बातों का सार था..!
चटकारे जिंदगी के लिए, जुबान-ए -नज़रिये से 'मजाल',
हिसाब लगाते, तो थाली में सिर्फ रोटी और अचार था...!!!
सादर :)
वक़्त ही वक़्त कमबख्त है भाई, क्या कीजे गर न कीजे कविताई !
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