वक़्त ही वक़्त कमबख्त है भाई, क्या कीजे गर न कीजे कविताई !
आपकी ये पंक्तियाँ पढ़कर मुझे तुरंत अपने ही कई साल याद आ गए। हम लोग भी हर नए साल पर बड़ी-बड़ी उम्मीदें बाँधते हैं, पर आखिर में हिसाब लगाओ तो सच में “रोटी और अचार” जैसा सीधा सा सच सामने खड़ा मिलता है।
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आपकी ये पंक्तियाँ पढ़कर मुझे तुरंत अपने ही कई साल याद आ गए। हम लोग भी हर नए साल पर बड़ी-बड़ी उम्मीदें बाँधते हैं, पर आखिर में हिसाब लगाओ तो सच में “रोटी और अचार” जैसा सीधा सा सच सामने खड़ा मिलता है।
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